Saturday, February 4, 2012

एक रात सुहानी


झिलमिल सितारों की चादर ओढ़े खड़ी थी एक रात सुहानी
फूलों की महेक मे झूम उठी थी एक रात सुहानी
पलकों की चिलमन से झाँक रही थी एक रात सुहानी
ना जाने क्या कह रही थी यह रात सुहानी

झिलमिल सितारों की चादर ओढ़े खड़ी थी एक रात सुहानी
धरती को छूने को मचल रही थी एक रात सुहानी
झरने सी बरस रही थी एक रात सुहानी
ना जाने क्या कह रही थी एक रात सुहानी

झिलमिल सितारों की चादर ओढ़े खड़ी थी एक रात सुहानी
मुट्ठी मे बंद कर रही थी एक रात सुहानी
कहीं दूर ताल मे भाग रही थी एक रात सुहानी
ना जाने क्या कह रही थी यह रात सुहानी

झिलमिल सितारों की चादर ओढ़े खड़ी थी एक रात सुहानी
बादल सा गरज रही थी, बिजली सा चमक रही थी, सूरज सा जल रही थी एक रात सुहानी
ना जाने क्या समेटे थी वो रात सुहानी
ना जाने क्या कह रही थी वो रात सुहानी

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