Saturday, February 4, 2012

संवाद की ओर


संवादहीनता से जन्मे हैं यह नये शब्द
जिस ओर उजाला है
बस उस पथ जाएगें अब ये पद
है भोझल जो माहौल यहाँ का
अब उसको हल्का होना होगा
बेजान हुए इस आलम मे
अब प्राण वायु को घुलना होगा
ख़त्म हो रहे इस अध्याय मे
कुछ नये पत्रों को जुड़ना होगा
रहस्यमय हो रहे मेरे इस व्यक्तित्व के
अब कुछ राज़ो को खुलना होगा
पथरीली इन आखों मे
अब कुछ सपनो को सजना होगा
सूने इस दिल मे
किसी को दस्तक देना होगा
इतने लंबे इंतज़ार को
अब तो आख़िर मिटना होगा
सूखी हर डाली पर
अब नयी कलियों को खिलना होगा
संवादहीनता से जन्मे हैं यह नये शब्द
जिस ओर उजाला है
बस उस पथ जाएगें अब ये पद

 

खुशी

एक खुशी है जो सबके मान मे है
तैरती है आवाज़ की तरह, धड़कती है दिल मे साँस की तरह,
मचल ही जाती हूँ हिरनी की तरह जब पाती हूँ आगोश मे अपने,
एक सूने मन की आस है खुशी जो सबके मान मे है!!

सुहाने मौसम की तरह रंगीन है खुशी
महसूस करने की आहट है खुशी
मद्धम सी चाँदनी है खुशी, मीठी यादों की रात है खुशी,
ज़िंदगी जीने का साथ है खुशी जो सबके मान मे है!!

सुघलती हुई तपन मे, महेकत्ि हुई शाम है खुशी
मेरे चेहरे की मुस्कुराहट है खुशी
फूलों से भी कोमल है खुशी, नींद उड़ाने का नाम है
एक खुशी जो सबके मन मे है

होठों का छलकता जाम है खुशी, बिन बदल बरसात है खुशी
पायल सा खनकता राग है खुशी
जानों तो तेरा मेरा नाम है खुशी
चाहो तो एक अल्प विराम है
खुशी पर कहीं एक प्रश्‍न चिन्ह है खुशी!!

झुल्फोन की खुली चाँदनी है खुशी या
तुम्हारी नज़रों से मेरी रातें धुली!!

एक रात सुहानी


झिलमिल सितारों की चादर ओढ़े खड़ी थी एक रात सुहानी
फूलों की महेक मे झूम उठी थी एक रात सुहानी
पलकों की चिलमन से झाँक रही थी एक रात सुहानी
ना जाने क्या कह रही थी यह रात सुहानी

झिलमिल सितारों की चादर ओढ़े खड़ी थी एक रात सुहानी
धरती को छूने को मचल रही थी एक रात सुहानी
झरने सी बरस रही थी एक रात सुहानी
ना जाने क्या कह रही थी एक रात सुहानी

झिलमिल सितारों की चादर ओढ़े खड़ी थी एक रात सुहानी
मुट्ठी मे बंद कर रही थी एक रात सुहानी
कहीं दूर ताल मे भाग रही थी एक रात सुहानी
ना जाने क्या कह रही थी यह रात सुहानी

झिलमिल सितारों की चादर ओढ़े खड़ी थी एक रात सुहानी
बादल सा गरज रही थी, बिजली सा चमक रही थी, सूरज सा जल रही थी एक रात सुहानी
ना जाने क्या समेटे थी वो रात सुहानी
ना जाने क्या कह रही थी वो रात सुहानी

Wednesday, February 1, 2012

भूल भी कभी कभी गुनाह की तस्वीर लेती है

भूल भी कभी कभी गुनाह की तस्वीर लेती है
नेक इरादों मे कभी कभी तो खलल पैदा होती है
नष्ट होती हुई संसार की श्रुतियाँ,
मेरे ह्रद्य को व्यंग की राह ले जा खड़ी करती हैं
विद्वनो के विचारों मे आग लगाते हुए,
आज हम अपने ही गुलदस्तान सज़ा लेते हैं
महानुभाओं के अध्याए पर धूल की परत,
बिछाते ही जाते हैं
नष्ट होतीं जा रहीं संसार की श्रुटियों को,
और भी हवा देते जा रहें हैं
बर बस ज़िंदगी मे दौड़ते, भागते हुए
तलाश के पदचिन्हों पर लाशों की कतार बिछाते जा रहें हैं
इसलिए तो स्पष्ट है, भूल भी कभी कभी गुनाह की तस्वीर लेती है,
बेरंग से चित्रों मे स्याही की जगह लहू की मीनार भरती जाती है!!

आज़ादी

पथ पथ झर झर,
चलता रहा में!
आज़ादी के आलिंगन को,
तरसता रहा में!!

थमा ना मेरा जोश,
घटा ना मेरा क्रोध,
बे फ़िज़ूल हैं सारे मोह,
क्यूँ है फिर ये आदमी के आदमी पर ज़ोर!!

एक मात्र ही आया हूँ,
कुछ न ले पाया तो कुछ ना दे पाया हूँ!
मिला जो तुझसे, घुल जायुंगा
विशाल समुद्र मे मिल जायूंगा!!

एक एक पल,
ज़िंदगी चल रही है मेरी!
सुइयों के इस खेल मे,
मौत हास रही है मेरी!!

बढ़(उ) तो बंधनो ने जकड़ा है,
लड़(उ) तो कायरों सा खड़ा है,
शरीर, आत्मा, श्रेष्ठता से परे हूँ,
आवादी के आलिंगन को तरसू!!
आवादी के आलिंगन को तरसू!!